Saturday, 9 May 2020

खण्डेलवाल ब्राह्मण

जगद् का गौरवशाली स्थान प्राप्त करनेवाली भारतीय ब्राह्मण जातियों में
खाण्डलविप्र खण्डेलवाल ब्राह्मण जाति का भी प्रमुख स्थान है । जिस प्रकार
अन्य ब्राह्मण जातियों का महत्व विशॆष रूप से इतिहास प्रसिद्ध है, उसी
प्रकार खाण्डलविप्र खण्डेलवाल ब्राह्मण जाति का महत्व भी इतिहास प्रसिद्ध
है । इस जाति में भी अनेक ऋषि मुनि, विद्वान् संत, महन्त, धार्मिक, धनवान,
कलाकार, राजनीतिज्ञ और समृद्धिशाली महापुरूषों ने जन्म लिया है ।
खाण्डलविप्र जाति में उत्पन्न अनेक महापुरूषों ने समय समय पर देश, जाति,
धर्म, समाज और राष्ट के राजनैतिक क्षेत्रो को अपने प्रभाव से प्रभावित किया
है । जिस प्रकार अन्य ब्राह्मण जातियों का अतीत गौरवशाली है, उसी प्रकार
इस जाति का अतीत भी गौरवशाली होने के साथ साथ परम प्रेरणाप्रद है ।
जिन जातियों का अतीत प्रेरणाप्रद गौरवशाली और वर्तमान कर्मनिष्ठ होते है वे
ही जातियां अपने भविष्य को समुज्ज्वल बना सकती है । खाण्डलविप्र जाति में
उपर्युक्त दोनो ही बाते विद्यमान हैं । उसका अतीत गौरवशाली है । वर्तमान को
देखते हुए भविष्य भी नितान्त समुज्ज्वल है । ऐसी अवस्था में उसके इतिहास
और विशॆषकर प्रारंभिक इतिहास पर कुछ प्रकाश डालना अनुचित न होगा ।
खाण्डलविप्र जाति की उत्पत्ति विषयक गाथाओं में ऐतिहासिक तथ्य सम्पुर्ण रूप
से विद्यमान है । इस जाति के उत्पत्तिक्रम में जनश्रुति और किंवदन्तियों
की भरमार नहीं है । उत्पत्ति के बाद ऐतिहासिक पहलूओं के विषय में जहाँ
जनश्रुति और किंवदन्तियों को आधार माना गया है, वह दूसरी बात है । उत्पत्ति
का उल्लेख कल्पना के आधार पर नहीं हो सकता । याज्ञवल्क्य की कथा को प्रमुख
मानकर खाण्डलविप्र जाति का उत्पत्तिक्रम उस पर आधारित नहीं किया जा सकता ।
महर्षि याज्ञवल्क्य का जन्म खाण्डलविप्र जाति में हुआ था । याज्ञवल्क्य का
उींव खाण्डलविप्र जाति के निर्माण के बाद हुआ था । याज्ञवल्क्य
खाण्डलविप्र जाति के प्रवर्तक मधुछन्दादि ऋषियों में प्रमुख देवरात ऋषि के
पुत्र थे ।

खाण्डलविप्र जाति का नामकरण एक धटना विशोष के आधार पर हुआ था । वह विशॆष
धटना लोहार्गल में सम्पन्न परशुराम के यज्ञ की थी, जिसमें खाण्डलविप्र जाति
के प्रवर्तक मधुछन्दादि ऋषियों ने यज्ञ की सुवर्णमयी वेदी के खण्ड दक्षिणा
रूप में ग्रहण किये थे । उन खण्डों के ग्रहण के कारण ही, खण्डं लाति
गृहातीति खाण्डल: इस व्युत्पति के अनुसार उन ऋषियों का नाम खण्डल अथवा
खाण्डल पडा था । ब्राह्मण वंशज वे ऋषि खाण्डलविप्र जाति के प्रवर्तक हुए ।

Thursday, 23 January 2020

भगवान परशुराम

परशुराम त्रेता युग (रामायण काल) के एक ब्राह्मण थे। उन्हें विष्णु का छठा अवतार भी कहा जाता है[1]। पौरोणिक वृत्तान्तों के अनुसार उनका जन्म भृगुश्रेष्ठ महर्षि जमदग्नि द्वारा सम्पन्न पुत्रेष्टि यज्ञ से प्रसन्न देवराज इन्द्र के वरदान स्वरूप पत्नी रेणुका के गर्भ से वैशाख शुक्ल तृतीया को ग्राम मानपुर के जानापाव पर्वत मैं हुआ था। (म.प्र) के इंदौर जिला मै हुआ था। वे भगवान विष्णु के आवेशावतार थे। पितामह भृगु द्वारा सम्पन्न नामकरण संस्कार के अनन्तर राम, जमदग्नि का पुत्र होने के कारण जामदग्न्य और शिवजी द्वारा प्रदत्त परशु धारण किये रहने के कारण वे परशुराम कहलाये। आरम्भिक शिक्षा महर्षि विश्वामित्र एवं ऋचीक के आश्रम में प्राप्त होने के साथ ही महर्षि ऋचीक से सारंग नामक दिव्य वैष्णव धनुष और ब्रह्मर्षि कश्यप से विधिवत अविनाशी वैष्णव मन्त्र प्राप्त हुआ। तदनन्तर कैलाश गिरिश्रृंग पर स्थित भगवान शंकर के आश्रम में विद्या प्राप्त कर विशिष्ट दिव्यास्त्र विद्युदभि नामक परशु प्राप्त किया। शिवजी से उन्हें श्रीकृष्ण का त्रैलोक्य विजय कवच, स्तवराज स्तोत्र एवं मन्त्र कल्पतरु भी प्राप्त हुए। चक्रतीर्थ में किये कठिन तप से प्रसन्न हो भगवान विष्णु ने उन्हें त्रेता में रामावतार होने पर तेजोहरण के उपरान्त कल्पान्त पर्यन्त तपस्यारत भूलोक पर रहने का वर दिया।


वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी। उन्होंने एकादश छन्दयुक्त "शिव पंचत्वारिंशनाम स्तोत्र" भी लिखा। इच्छित फल-प्रदाता परशुराम गायत्री है-"ॐ जामदग्न्याय विद्महे महावीराय धीमहि, तन्नोपरशुराम: प्रचोदयात्।" वे पुरुषों के लिये आजीवन एक पत्नीव्रत के पक्षधर थे। उन्होंने अत्रि की पत्नी अनसूया, अगस्त्य की पत्नी लोपामुद्रा व अपने प्रिय शिष्य अकृतवण के सहयोग से विराट नारी-जागृति-अभियान का संचालन भी किया था। अवशेष कार्यो में कल्कि अवतार होने पर उनका गुरुपद ग्रहण कर उन्हें शस्त्रविद्या प्रदान करना भी बताया गया है।

sources from wikipedia

Thursday, 16 May 2019

श्री खाण्डल विप्र शैक्षणिक संस्थान एवं छात्रावास

समाज के 100 से अधिक गणमान्य स्वजनों की उपस्थिति में दिनांक 25 जुलाई, 1994 को श्री नवजीवन रसायन शाला रामगंज बाजार जयपुर में एक बैठक का आयोजन किया गया जिसमें सर्व सम्मति से निर्णय लिया गया कि समाज के निर्धन एवं प्रतिभाशाली छात्रों को जो सुदूर गांवों में रहते है। उच्च अध्ययन हेतु राजधानी में आने पर आवास एवं भोजन की समस्याओं के साथ मार्ग निर्देशन के अभाव से ग्रस्त है। इसी संवेदना को लेकर श्री खाण्डल विप्र सेवा संस्थान का इसी दिन जन्म हुआ जिसकी स्थापना का एक मात्र लक्ष्य प्रतिभाशाली छात्रों को न्यूनतम शुल्क पर आवास भोजन एवं लक्ष्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों के मार्ग निर्देशन हेतु एक शैक्षणिक संस्थान एवं छात्रावास भवन का निर्माण करना है। चार वर्ष के अर्थक परिश्रम एवं अपने राजकीय सम्यकों का श्रेष्ठ उपयोग कर सेवा संस्थान में दिनांक 7 मई 1998 को 2275 वर्ग मीटर का भूखण्ड राजस्थान विश्वविद्यालय के समीप झालाना संस्थाकन क्षेत्र जयपुर विकास प्राधिकरण द्वारा मात्र 16 लाख 58 हजार रूपये में आवंटित करवा कर कब्जा प्राप्त किया। सन 1998 की परशुराम जयन्ती अक्षया तृतीया के दिन इस भवन का भूमि पूजन के साथ ही निर्माण का श्रीगणेश हुआ। जिससे समाज के 200 से अधिक गणमान्य सज्जान उपस्थित थे। सनृ 1998 की दीपावली के स्नेह मिलन के अवसर पर निर्माणाधाीन भवन के प्रांगण में 300 सदस्यों की स्नेह सभा में विचार विमर्श कर श्री खाण्डल विप्र सेवा संस्थान में सर्व सम्मति से भूमि को भवन के निर्माण एवं विकास के लिये श्री खाण्डल विप्र सेवा संस्थान का गठन कर उसे सौंप दिया श्री खाण्डल विप्र सेवा संस्थान ट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष के रूप में श्री बनवारी लाल जोशी, नई दिल्ली के प्रथम कार्यकाल में ही भवन का निर्माण एक करोड़ रूपये के वृहद लक्ष्य के साथ अक्टूबर 2000 की दिवाली से पहले पूरा कर छात्रावास का प्रारम्भ किया गया।
 
पुनः ट्रस्ट के द्वितीय कार्यकाल में श्री मदन लाल जी बणसिया अध्यक्ष के रूप में पदासीन हुये और छात्रावास में छात्रों की अधिकता को देखते हुये तीसरी मंजिल का कार्य 2003 के जून माह में पूरा किया गया और पूरे निर्माण एवं विकास कार्य में समाज के उदार दान दाताओं ने एक करोड़ रूपये का अभूतपूर्व योगदान मात्र चार वर्ष में पूरा कर एक कीर्तिमान स्थापित किया उल्लेखनीय बात यह है कि एक करोड़ रूपये के निर्माण लक्ष्य को पूरा करने के साथ ही महिला छात्रावास की आवश्यकता का अनुभव किया गया एवं मात्र दो माह के अल्प काल में पुनः जयपुर विकास प्राधिकरण से अपने उद्देश्यों की पूर्ति में सफल रहने के कारण संस्थान भवन के नैऋत्य कोण में 752 वर्ग मीटर का भूखण्ड जो 2002 में आवंटित करवाया गया इस पर 50 लाख की लागत महिला छात्रावास का प्रारम्भ देवोत्थान एकादशी 2003 को क्रियान्वित पूजन एवं संत समागम के साथ उत्साह पूर्वक किया गया। इन दोनों परियोजनाओं में पाँच वर्ष के अतंराल में एक करोड़ 50 लाख रूपये की दान राशि का प्राप्त होना समाज की नीति परायणता एवं श्रेष्ठ कार्यों के लिये शिक्षा के विकास में अपना उदार योगदान का श्रेष्ठ उदाहरण है।
 
संस्थान भवन में 111 आवासीय छात्रों के लिये तथा 50 छात्राओं के लिये सुविधा महिला छात्रावास में अपनी पूरी क्षमता के साथ शिक्षा के उत्थान हेतु प्रयासरत है। इन दोनों छात्रावासों में पूर्व कालिक निदेशक, दो पृथक छात्रावास अधीक्षक तथा दोनों छात्रावासों में पृथक-पृथक 8 कम्प्यूटर जिन पर असीमित इन्टरनेट की सुविधा है। पुस्तकालय, अध्ययन कक्ष, सभा कक्ष, भोजनालय, अतिथि कक्ष, कार्यालय कक्ष, चौबीस घंटे सुरक्षा प्रहरी की व्यवस्था, नल के पानी की व्यवस्था एवं विशाल हरे भरे बगीचे वृक्षों से सुशोभित है। खाण्डल विप्र सेवा संस्थान ट्रस्ट द्वारा संचालित पुरूष एवं महिला छात्रावासों में विद्वान विशेषज्ञों की निःशुल्क सेवायें मार्ग दर्शन हेतु मार्ग निर्देशन एवं भविष्य निर्माण हेतु उपलब्ध है। संस्थान समाज के प्रबुद्ध वर्ग एवं उदार व्यवसायी वर्ग के समाज हित में आपसी तालमेल का सुन्दर उदाहरण है।
 
छात्रावास संचालन हेतु अग्रिम पृष्ठ पर दी गई सूची के अनुसार ट्रस्ट का निर्माण किया गया है इसमें पूरे देश से अपने अपने क्षेत्रों से मूर्घन्य विद्वान प्रोफेसर, डाक्टर, वकील, सी.ए., प्रशासनिक सेवा वर्ग के उच्च पदस्थ  अधिकारी इजिनियंर एवं सफल उदार उद्यमी प्रतिभाओं को शामिल किया गया है। यह वर्ग की बात है कि सभी ट्रस्टी गण सुन्दर आपसी तालमेल के साथ संस्थान के समाज में विकास के लिए प्रयत्नशील है। 


ADDRESS AND CONTACT 
Shree Khandal Educational Institute & Hostel
J-3A, Jhalana Institutional Area, Jaipur- 302004, Rajasthan - India
Ph.: 0141-2701154
email: sevasansthanjpr@gmail.com & info@sevasansthan.com 

Sources from : 

Friday, 10 March 2017

भगवान परशुराम रथ यात्रा

सभी ब्राह्मण बंधुओं से निवेदन है कि भगवान परशुराम रथ यात्रा  रथ यात्रा संपूर्ण भारतवर्ष में जाएगी आप सभी बंधु सादर आमंत्रित हैं |

post by :- BANWARI SHARMA

Monday, 26 December 2016

रक्तदान जीवनदान है ( Donate blood and save life )

रक्तदान  जीवनदान है। हमारे द्वारा किया गया रक्तदान कई जिंदगियों को बचाता है। इस बात का अहसास हमें तब होता है जब हमारा कोई अपना खून के लिए जिंदगी और मौत के बीच जूझता है। उस वक्त हम नींद से जागते हैं और उसे बचाने के लिए खून के इंतजाम की जद्दोजहद करते हैं।

अनायास दुर्घटना या बीमारी का शिकार हममें से कोई भी हो सकता है। आज हम सभी शिक्षि‍त व सभ्य समाज के नागरिक है, जो केवल अपनी नहीं बल्कि दूसरों की भलाई के के लिए भी सोचते हैं तो क्यों नहीं हम रक्तदान के पुनीत कार्य में अपना सहयोग प्रदान करें और लोगों को जीवनदान दें।


Saturday, 28 May 2011

खाण्डल विप्र (खण्डेलवाल ब्राह्मण) गोत्र -


१ माठोलिया
मठ्मालयमासाध जाप जगदीश्वम ।
अतो माठालयो भूमौ ब्राह्नणः ख्यातिमागतः ॥१॥
मठ नमक स्थान में बैठकर जो जगदीश्वर का जप किया करता था, वह ब्राह्नण पृथ्वी पर मठालय (माठोलिया) नाम से विख्यात हुआ ॥१॥
मठालय का माठोलिया रूप समय पाकर बना हुआ है। लोक में अन्य परिवर्तनों के समान शाब्दिक परिवर्तन भी होते रह्ते है, उसी अनुसार आरंभ का मठालय समय पाकर माठालया और फिर माठोलिया रुप में परिवर्तित हो गया।
२. बढाढरा
वंटकोलं समाहत्य चाहारमनुकल्पयॅत ।
ततस्तस्य समाह्वानं वटाहारमिति क्षितौ ॥२॥
बडवंटे (वरगद के फल) इकट्टे कर जो ॠषि भोजन करता था, उसे लोग वटाहार ( बढाढरा ) कहने लग गये ॥२॥
उच्छवृत्ति परायण ऋषियो में कन्दमूल खाने का जो प्रचलन था, उसके अनुसार ॠषि स्वेच्छानुसार कन्दमूल का चुनाव करते थे।
३. श्रोत्रिय (सोती)
विप्रेभ्योपि ददौ धीमान वेदान साड्गाननुक्रमात ।
पाठयित्वा ततो विप्रः श्रोत्रियो विश्रुति गतः ॥३॥
जो बुद्धिमान विप्र छहो अंगो सहित अध्यापन द्वारा ब्रह्मणो को वेद ज्ञान प्रदान करता था वह श्रोत्रिय (सोती) के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥३॥
४. सामरा
देवैः सह सदा यस्य व्यवहारः प्रवर्तते ।
सामरः स तु विख्यातः स्वर्गे वा क्षितिमंडले ॥४॥
जिस विप्र का लेनदेन देवताओ के साथ रहा करता था, वह स्वर्ग और पॄथ्वी मण्डल में सामर (सामरा) नाम से विख्यात हुआ ॥४॥
५. जोशी
ज्योतिर्विदाम्बरो धीरो यज्ञवैलां ददावथ ।
ज्योतिपीति समाख्यातो देवविप्रसभासु यः ॥५॥
ज्योतिर्विदो में जो विप्र यज्ञ वेला का मुहूर्त देने वाला था, वह देव विप्र सभाओं में ज्योतिषी (जोशी) के नाम से विख्यात हुआ ॥२॥
एक दीर्घकाल से आर्य हिन्दू समाज में ज्योतिषियों के लिये जोशी शब्द का व्यवहार प्रचलित है। इसी आधार पर ज्योतिविंद अथवा ज्योतिष मर्मज्ञ का गोत (सासन या अवटंक) जोशी नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
६. रणवा
रणमुद्व्हते योऽसौ यज्ञध्नैदैत्यपुंगवैः ।
यज्ञसंरक्षणयैव रणोद्वाहीं प्रथां गतः ॥६॥
जो यज्ञ नाशक दैत्य पुंगर्वो से युध्द कर यज्ञ की रक्षा करता था, वह ऋषि रणोद्वाही (रणवाद अथवा रणवा) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥६॥
ऋषि समाज में आत्मरक्षण के लिये शस्त्र ग्रहण करना उपयुक्त समझा जाता था। वह श्लोक इसकी पुष्टि करता है।
७. बीलवाल
सुपक्वानि च विल्वान यज्ञार्थ संहतानि च ।
विल्ववानथ स ख्यातो ब्राह्णाणेषु द्विजोत्तमः ॥७॥
जो द्विजोत्तम पके हुए विल्व फल इकट्ठे कर यज्ञ के लिये लाया करता था, वह ब्रह्मणो में विल्वान (बीलवाल) नाम से विख्यात हुआ ॥७॥
८. बील
विल्वमालाच शिरसि गले च भुजयोरपि ।
विल्वमुले स्थितो योऽसौ तस्माद्विल्व इति श्रुतः ॥८॥
जो सिर, गले और भुजाओं में विल्व की मालायें धारण करता तथा जो विल्व के नीचे बैठा करता था, वह इसी कारण विल्व (बील) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥८॥
९. कुँजवाड
लतागृह समाश्रित्य जजाप परमं जपः ।
कुज्वाडिति विख्यातो ब्राम्हणो ब्रम्हवित्तमः ॥९॥
लतागृह में बैठकर जिसने उत्कृष्ट जप किया, वह ब्रह्म्वेत्ता ब्रह्म्ण कुन्जवाद (कुन्जवाड) नाम से विख्यात हुआ ॥९॥
ऋषि लोग प्रकृति प्रेमी होते थे । उनका बौद्धिक विकास प्रकृति के सानिध्य से ही होता था । वे लोग लता कुँजों में ही जीवन बिताते थे ।
१०. सेवदा
ररक्ष सेवधिं द्रव्यमृषीणां परमाज्ञया ।
तस्मात्स सेवधिर्नामा विख्यातो भूवि ब्राह्मणः ॥१०॥
जो ऋषियों की आज्ञानुसार यज्ञीय धन की रक्षा किया करता था, वह ब्राह्म्ण पृथ्वी पर सेवधि (सेवदा) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥१०॥
११. चोटिया
शिखा वृद्धतरा यस्य सर्वांगे लुलिता परा ।
तस्माच्चौल इति ख्यातो भूसुरो भुविमंडले ॥११॥
बडी भारी चोटी जिसके सारे शरीर पर पडी रहा करती थी, वह ब्राह्म्ण पृथ्वी मंडल में चौल (चोटिया) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥११॥
१२. मणडगिरा
मणडमागिरते नित्यं दन्तहीनो द्विजोत्तमः ।
ततो मणडगिलः ख्यातः सर्वदा भुवि मंण्ड्ले ॥१२॥
जो द्विज श्रेष्ठ दन्त हीन होने के कारण प्रतिदिन चावलो का मांड पिया करता था, इसी कारण वह पृथ्वी मण्डल में मण्डगिल (मंडगिरा) नाम से विख्यात हुआ ॥१२॥
१३. सुन्दरिया
सुन्दरस्तुन्दिलो योऽसौ त्रिवल्या परिशोभते ।
तेनैव सुन्दरो भुमौ विख्यातो विप्रसत्तमः ॥१३॥
जिस श्रेष्ठ ब्राह्म्ण की तोंद त्रिवली से सुशोभित थी वह उसी कारण पृथ्वी पर सुन्दर (सुन्दरिया) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥१३॥
१४. झकनाडा
झषनर्तनमालोक्य परमानन्दमात्मनः ।
यो मेने मनसा धीमान झषनाट्य इति स्मृतः ॥१४॥
जो बुद्धिमान ब्राह्म्ण मछलियों का नृत्य देखकर अपने मन में आनन्द का अनुभव करता था, वह झषनाटय (झखनाडा) नाम से स्मरण किया गया ॥१४॥
१५. रूंथला
चरूस्थाली करे कृत्वा प्रजपन्मंत्रमुत्त्मम ।
अजोहवोत्तदा वन्दौ चरूस्थालीति विश्रतः ॥१५॥
जो चरूस्थाली को हाथ में लेकर मंत्र जपता हुआ अग्नि में आहुतियां दिया करता था वह चरुस्थाली (रुंथला) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥१५॥
१६. गोधला
गोधूली समये नित्यं यो भुनक्ति महामतिः !
स तद्व्रतप्रभावेण गोधूलिख्यातिमागतः ॥१६॥
जो महामति गोधूलि वेला में भोजन किया करता था, वह उस ब्रत के प्रभाव से गोधूली (गोधला) नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
१७. गोरसिया
गोतक्र यः पिवेन्नित्यं मन्यदन्नं न भज्ञयेत ।
गोरस इति ख्यातो विप्रः पुण्येन कर्मण ॥१७॥
जो नित्य केवल गोतक (गाय की छाछ) पिया करता था और दूसरा अन्न नहीं खाता था, वह विप्र पुण्य कर्म से गोरस (गोरसिया) नाम से विख्यात हुआ ॥१७॥
१८. झुन्झुनाद
यज्ञस्यान्ते च यो नित्यं सामवेदं स्वरान्वितम ।
धुनोति ब्राह्म्णः श्रीमान झुन्झुनाद इतीरितः ॥१८॥
यज्ञ समाप्ति पर जो सस्वर सामवेद का गान करता था, वह झुन्झुनाद (झुन्झुनादा) नाम से पुकारा जाने लागा ॥१८॥
१९. भूमरा
भूगर्तान्यत्र कूत्रापि द्य्ष्ट्वा भरति यः सदा ।भूभरः स तु विख्यातः सर्वत्र सुखदो द्विजः ॥
जहा कहीं पृथ्वी में गड्टों को देखकर जो सदा उनको पात देता था, सर्वत्र सुख देने वाला वह द्विज भूभर ( भूभरा ) नाम से बिख्यात हुआ ॥१९॥
२०. वटोटिया
वटमूलमुपाश्रित्य नैत्यकं कुरूते तु यः ।
वटोधा धै समाख्यातो भू सुरेसु निरन्तरम् ॥२०॥
जो वरगद के नीचे बैठकर नित्य कर्म करता था, बह निरन्तर भूसुर वर्ग में वटोधा ( वटोटिया अथवा वट ओटिया ) नाम से विख्यात हुआ ॥२०॥
२१. काछ्वाल
कक्षमाश्रित्य वैधास्तु जुहुयामंत्रसंयुतम ।
क्ज्ञावानिति सर्वत्र विख्यातः ऋषिपुड्गवः ॥२१॥
जो वेदी के कोने में बैठकर मंत्रोच्चारण पुर्वक आहुति दिया करता था, वह ऋषि श्रेष्ठ सर्वत्र कज्ञावान (काछवाल) नाम से विख्यात हुआ ॥२१॥
२२. शिवोद्वाही (सोडवा)
शिवमुद्वहते कण्ठे नित्यं भक्त्या मुनिमर्हान ।
शिवोद्वाहीति लोकोस्मिन तेन ख्यातो विदाम्बरः ॥२२॥
जो महामुनि भक्ति पुर्वक नित्य कण्ठ में शिवजी को धारण करता था, वह शिवोद्वाही (सोडवा) नाम से लोक में प्रसिद्ध हुआ ॥२२॥
२३. भाटीवाडा
भट्टस्य रूपमास्थाय युध्यते यो निरन्त्म ।
तेनैव भुतले ख्यातो भाटीवानिति पंडितः ॥२३॥
योद्धा का रूप धारण कर जो निरन्तर युद्ध किया करता था वह पण्डित भाटीवान (भाटीवाडा) नाम से पृथ्वी तल पर विख्यात हुआ ॥२३॥
२४. गोवला
गाः पालयति यः स्नेहान्नियं धर्मपरायणः ।
तासामेत्र बलो यस्य गोबलः कथितो द्विजैः ॥२४॥
जो प्रेम पूर्वक धर्मपरायण होकर नित्य गौओं का पालन करता था और जिसके गोओं का बल ही प्रधान था वह द्विजों द्वारा गोवल (गोवला) नाम से पुकारा गया ।
२५. वशीवाल
वशीकृत्य जनान् सर्वान् वर्तते क्षितिमण्डले ।
तत्प्रभावात् समाख्यातो वशीवानिति भूतले ॥२५॥
जो सब जनों को वश में कर निवास करता था, वह उसी प्रभाव से पृथ्वी पर वशीवान् (वशीवाल) नाम से विख्यात हुआ ॥२५॥
२६. मंगलहारा
मनसा वचसा नित्यं सर्वेषामभिवाच्छति ।
मंगलाहरति योऽसौ तस्मान्मंगलहारकः ॥२६॥
मन और वाणि से जो सब का भला चाहता था और सब का मंगल करता था, वह मंगलाहर (मंगलहारा) नाम से विख्यात हुआ ।
२७. बोचीवाल
जो क्रान्तकर्मा धर्मान्धर्मात्मकः कविः ।
तस्मादसौ च विख्यातो वोचीवानिति नामतः ॥२७॥
जो क्रान्तकर्मा धर्मात्मा ऋषि यज्ञशाला में धार्मिक उपदेश दिया करता था, यह इसी कारण वोचीवान् (वोचीवाल) नाम से विख्यात हुआ ॥२७॥
२८. धुगोलिया
दियो गोलमथालम्व्य वर्णितं व्योमविस्तरम् ।
तस्मादत्र समाख्यातो धूगोल इति विद्वरः ॥२८॥
खगोल का अवलम्बन कर जिसने खगोल का विस्तार पूर्वक वर्णन किया, इसी कारण वह ज्ञानियों में श्रेष्ठ धूगोल (दुगोलिया) नाम से विख्यात हुआ ॥२८॥
ऋषियों में नाना प्रकार की गवेषणायें करने का प्रचलन था । इस अवटंक के प्रवर्तक ऋषि ने भी खगोल का प्रामाणिक अनुसन्धान किया था ।
२९. कुन्जवाडा
गुन्जावितानमाछाध वटस्य परितो बुधः ।
तत्र चोवास यो धीरो गुन्जावाट इति श्रुतः ॥२९॥
जो विद्वान् गुन्जा के लता कुन्जों को बड पर चढाकर उनके नीचे निवास करता था, वह गुन्जावाट (गुन्जावडा) नाम से विख्यात हुआ ॥२९॥
३०. परवाल
प्रवालगौरवर्णश्र्च प्रवालैश्चैव मण्डितः ।
प्रवालमालयोपेतः प्रवालः स च कथ्यते ॥३०॥
जो ऋषि प्रवाल के समान गौर वर्ण था और जो प्रवालों से विभूषित और प्रवाल मालाधारी था, उसका नाम लोगों ने प्रवाल (परवाल) रक्खा ॥३०॥
३१. हूचरा
हू हू नामानमाहूय चानद्दज्ञवेश्मनि ।
चारयामास गान्धर्व तस्माद्धूचरको द्विजः ॥३१॥
यज्ञगृह में हूहू नामक गान्धर्व को बुलाकर जो गान्धर्व वेद का गायन करवाया करता था, वह द्विज (हूचरिया) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥३१॥
३२. नवहाल
जाम्बूद्रुममयं नूत्नं हलं जप्राह यो द्विजः ।
चकर्ष याज्ञिकीं भूमिं नवहाल प्रथां गतः ॥३२॥
जिसने जामुन का नया हल बना कर यज्ञ की भूमि को जोता, वह ब्राह्मण नवहाल नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥३२॥
३३. वांठोलिया
यज्ञवाटमुपागम्य ह्यलिखन् स्थण्डिलं तु यः ।
जजाप परमं जापं तेन वांटोलिकः स्मृतः ॥३३॥
जो यज्ञ कि वेदी में रंग भरा कर गायत्री का जप किया करता था, वह उसको लोग वांठोलिक (वांठोलिया) कहते थे ॥३३॥
३४. पीपलवा
अश्वत्थमूलमासाद्द तस्वैव फलमत्ति यः ।
पिप्लवानिति ख्यातो भूमौ विप्रवरस्ततः ॥३४॥
पीपल के पेड की जडो में बैठकर जो पीपल के ही फल खाया करता था, वह विप्रवर पिप्पलवान (पीपलवा) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥३४॥
३५. मुछावला
श्मश्रुभिर्मुखमाच्छन्नो वर्तते यज्ञमण्डले ।
श्मश्रुलो हि समाख्यातः समुद्रान्तर्गतो भुवि ॥३५॥
दाढी मूछों से जिसका मुँह ढका रहता था, वह ऋषि द्विजों में श्मश्रुन (मुछ्वाल) नाम से विख्यात हुआ ॥३५॥
३६. तिवाडी
त्रिद्वार समागम्य जजाप जननी श्रुतिम् ।
त्रिवारीति च लोकेस्मिन् विख्यातिमधुना गताः ॥३६॥
जो तीन द्वार का मकान बनाकर उसमें गायत्री जपा करता था, वह इस लोक में (तिवाडी) के नाम से विख्यात हुआ ॥३६॥
३७. पराशला
पराशार्थ च यो लाति यस्मात्कस्माद्धनं बहुः ।
ततः पराशलो विप्रो विख्यातो भुवनत्रये ॥३७॥
जो ऋषि समिधा संचय के लिये इधर उधर से पर्याप्त धन लाया करता था, वह लोकत्रय में पराशल (पराशला) नाम से विख्यात हुआ ॥३७॥
३८. घाटवाल
घट्टमाश्रित्य कुण्डस्य भारत्याः मंत्रमुज्जपन् ।
घट्टवानिति विप्रेशः सर्वत्र विदितो ह्यभूत् ॥३८॥
जो यज्ञवेदी के किनारे बैठकर सरस्वती का जप किया करता था, वह सर्वत्र घट्टवान (घाटवाल) नाम से विख्यात हुआ ॥३८॥
३९. बणसिया
वने च निवसन्यो वै मन्त्र च द्वादशात्मकम् ।
जजाप परया भवत्या वानस्थो विश्रुतो भुविः ॥३९॥
जो वन में निवास करता हुआ द्वादश अक्षरात्मक "नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का जाप किया करता था, उसको वनाश्रय (वणसिया अथवा वनसायिक) नाम से पुकारते थे ॥३९॥
४०. सिंहोटा
सिंहपृष्टसमारूह्य भगवत्याः प्रसादतः ।
सर्वत्राटति यो धीमाँस्ततः सिंहोटकः स्मृतः ॥४०॥
जो बुद्धिमान ऋषि भगवती के प्रसाद से सिंह पर चढकर सर्वत्र घूमा करता था, वह सिंहोटक (सिंहोटा अथवा सिंहोटिया) नाम से विख्यात हुआ ॥४०॥
४१. भुरटिया
भूर्भटं च तृणं सम्यगादाय शयनं रचेत्
भूर्भट इति विख्यातो बभूव धरणितले ॥४१॥
जो भरूंट घास को बिछाकर सोया करता था, वह धरणि तल पर भूर्भट (भरूटिया अथवा भुरटिया) नाम से विख्यात हुआ ॥४१॥
४२. टंकहारी
टंकं टंकं समादाय चाहारं कुरूते सदा ।
टंकहारीति विख्यातो लोके च परमर्षिभिः ॥४२॥
जो नित्य चार चार मासे के ग्रास लेकर भोजन किया करता था, वह महर्षियो द्वारा टंकहारी नाम से विख्यात हुआ ॥४२॥
४३. अजमेरिया
अजे ब्रह्मणि यो मेधां संयोज्य कर्म संचरेत ।
अजमेधा महीपृष्टे सर्वत्र विदितो ह्यभूत् ॥४३॥
जो ऋषि अजन्मा ब्रह्म में बुद्धि लगा कर कर्म किया करता था, वह सर्वत्र पृथ्वी तल पर अजमेधा (अजमेरिया) नाम से विख्यात हुआ ॥४३॥
४४. डीडवाणिया
डिंडिमं च पुरस्कृत्य विचचार महीतले ।
डिंडिमवानिति ख्यातो भूसुरो भूमिमण्डले ॥४४॥
जो डमरू लेकर पृथ्वी पर विचरण किया करता था, वह ब्राह्मण डिंडिमवान (डीडवाणिया अथवा डीडवाणा) नाम से पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुआ ॥४४॥
४५. निटाणिया
निधनानि च भूयांसि समादाय धनेश्र्वरात् ।
विभज्य याचकेभ्योऽदान्निधानियो हि सोप्यभूत ॥४५॥
जो ऋषि सुबेर से बहुत सा धन लाकर याचकों में बांटा करता था, वह निधानीय (निटानिणिया) नाम से विख्यात हुआ ॥४५॥
४६. डाभडा अथवा डावस्या
दर्भभारं समादाय तस्यास्तरणमाकहोत् ।
तेनैव हेतुना विप्रः दर्भशायीति विश्रुतः ॥४६॥
जो डाभ बिछा कर सोया करता था, वह दर्भशायी (डाभडा अथवा डावस्या) नाम से विख्यात हुआ ॥४६॥
४७. खडभडा अथवा निठुरा
निष्ठुरं वचनं यस्तु वदत्येव जनेष्विह ।
तन्नाम निष्ठुरो लोके बभूव परमाद्रुतम् ॥४७॥
जो ऋषि मनुष्यों के समूह में कठोर वचन बोला करता था, इसीसे वह परमादभुत काम करने वाला निष्ठुर (निठुर अथवा खडभडा) नाम से विख्यात हुआ ॥४७॥
४८. बोहरा अथवा भूसुरा
व्यवहारप्रियो लोके व्यवहरति जनेष्विह ।
व्यवहारीति विप्रोऽसौ सततं ख्यातिमागतः ॥४८॥
व्यवहार प्रिय जो ऋषि संसार में लेन देन का व्यवहार करता था, वह विप्र निरन्तर व्यवहारी (बोहरा अथवा भूसुरा) नाम से विख्यात हुआ ॥४८॥
४९. वांटणा
आयान्तं ब्राह्मणं द्दष्ट्वा तस्मै यच्छति यो धनम् ।
तस्मात्तु विप्रो विख्यातो विभाजीति जनेषु सः ॥४९॥
जो समागत ब्राह्मण को देखकर उसे धन दिया करता था, वह विभाजी (वांटणा) नाम से विख्यात हुआ ॥४९॥
५०. शकुन्या
शकुनानि च सर्वाणि विचचार विचारयन् ।
शाकुनीति ततो लोके विख्यातिं गतवान्मुनिः ॥५०॥
जो मुनि समस्त शकुनों का विचार करता हुआ विचरण करता था, वह लोक में शाकुनि (शकुन्या) नाम से विख्यात हुआ ॥५०॥

चोटिया


शिखा वृद्धतरा यस्य सर्वांगे लुलिता परा ।
तस्माच्चौल इति ख्यातो भूसुरो भुविमंडले ॥११॥
बडी भारी चोटी जिसके सारे शरीर पर पडी रहा करती थी, वह ब्राह्म्ण पृथ्वी मंडल में चौल (चोटिया) नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥११॥